समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (Mulayam singh Yadav) का आज (22 नवंबर) को 81 साल के हो गए हैं. 22 नवंबर 1939 को एक साधारण से परिवार में उनका जन्म हुआ. उन्होंने अपने शैक्षणिक जीवन में तीन डिग्री (B.A, B.T और राजनीति शास्त्र में M.A) हासिल की. उनकी पूरी पढ़ाई केके कॉलेज इटावा, एक.के कॉलेज शिकोहाबाद और बीआर कॉलेज आगरा यूनिवर्सिटी से पूरी हुई.
राम मनोहर से प्रेरित होकर बने समाजवादी
राजनीति में कूदने के लिए मुलायम सिंह यादव को सबसे ज्यादा राम मनोहर लोहिया ने प्रेरित किया. मुलायम का राजनीतिक सफर बेहद लंबा रहा है. मुलायम ने 1960 में राजनीति में कदम रखा और 1967 में पहली बार वो विधानसभा चुनाव जीत विधायक बने. समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के संपर्क में आने के बाद 1967 में उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव में जीत हासिल की थी. साथ ही 1975 में आपातकाल के दौरान मुलायम को जेल भी जाना पड़ा था.
तीन बार रहे यूपी के मुख्यमंत्री और एक बार देश के रक्षा मंत्री
उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना भले ही अभी भी अधूरा हो पर उन्होंने सियासी दांव में सभी को मात दी है. 1977 में वो उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने, कॉ-ऑपरेटिव और पशुपालन विभाग संभाला. इसके बाद 1980 में उन्होंने लोकदल का अध्यक्ष पद संभाला. यही नहीं उन्होंने 1985-87 में उत्तर प्रदेश में जनता दल का अध्यक्ष पद भी संभाला. 1989 में वो पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की. 1993-95 में वो दूसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री बने और 1996 में मैनपुरी से 11वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री का पद संभाला. 2019 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने मैनपुरी से जीत हासिल की और सातवीं बार सांसद बने.
'मंडल के मसीहा' वीपी सिंह के खिलाफ लड़ी अस्तित्व की लड़ाई
मुलायम ने अपने राजनैतिक अस्तित्व की सबसे मुश्किल लड़ाई उस वक्त लड़ी थी, जब वीपी सिंह यूपी के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. इटावा के कद्दावर कांग्रेसी नेता बलराम सिंह यादव और मुलायम के बीच की सियासी रंजिश जबरदस्त सियासी रंजिश थी जिसने कई लोगों की जान ली. अस्सी के दशक में दर्शन सिंह बनाम मुलायम की जंग के किस्से लोग आज भी याद करते हैं.
1980-82 में मुख्यमंत्री रहते हुए वीपी सिंह ने चंबल और यमुना के बीहड़ों से डकैतों के सफाए के लिए बड़ा अभियान छेड़ा था. पुलिस को खुले हाथों से डकैतों को पकड़कर मारने की छूट दे दी गई थी. किसी पर अगर डकैतों का साथ देने का शक भी होता था तो पुलिस उससे सख्ती से निपटती थी. डकैतों के खिलाफ छेड़े गए इस अभियान में मुलायम बेहद आसान टारगेट बन गए. उस वक्त ही इंदिरा गांधी को पिछड़े वर्ग के एक बड़ी राजनैतिक ताकत के तौर पर उभरने का एहसास हुआ. चौधरी चरण सिंह पिछड़े वर्ग की उस ताकत के प्रतीक थे. मुलायम सिंह यादव...चौधरी चरण सिंह के शागिर्द थे और उनका उस वक्त राजनीतिक भविष्य उज्जवल दिख रहा था. इटावा, एटा, कानपुर, आगरा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनैतिक बीहड़ों में जिसके पास बाहुबल होता था, वही राजनीति का सितारा माना जाता था. 1980 के दशक में पिछड़े वर्ग की राजनीति जोर पकड़ रही थी. मुलायम जैसे पिछड़े वर्ग के नेता राजनीति में राजपूत और ब्राह्मण नेताओ को चुनौती दे रहे थे.
उस दौर में मुलायम सिंह यादव अपनी राजनीति के बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे थे. वो रोज एक सियासी मोर्चे पर जंग लड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे. अगले कुछ सालों में मुलायम ने खुद को 'मंडल मसीहा' के तौर पर पेश किया और पिछड़े वर्ग के लोगों हितों के सबसे बड़े संरक्षक बनकर उभरे.
सोनिया गांधी को पीएम बनने से रोका
1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की हार के बाद सोनिया ने जीत का दावा किया था और सरकार बनाना चाहती थीं. एक वोट से वाजपेयी सरकार गिरने के बाद सोनिया ने राष्ट्रपति भवन के सामने ही 272 सांसदो के समर्थन का दावा किया था. सिर्फ मुलायम के विरोध के चलते सोनिया पीएम नहीं बन सकी थीं. मुलायम को समर्थन न देने के बाद कांग्रेस और मुलायम सिंह में राजनैतिक जंग का एक और दौर छिड़ गया था. जो 1999 से 2009 तक चला था.
सियासी दांवपेंच का जवाब नहीं
बीते लोकसभा चुनाव में जब नरेंद्र मोदी दूसरी बार देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनावी जंग लड़ने जा रहे थे, ठीक उसी वक्त मुलायम ने सबको यह कहकर चौंका दिया था कि मोदी को दोबारा पीएम बनना चाहिए. उस समय मुलायम के इस दांव से समूचा विपक्ष अचकचा गया था. अपने राजनीतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव अपने सियासी दांवपेचों के हमेशा हैरान करते रहे हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वो क्या फैसला लेंगे, इसकी जानकारी सिर्फ उन्हें ही होती है.
साल 2016 में एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुलायम ने वहां मौजूद लोगों को अपने बयान से चौंकाया था. विपक्षियों पर बदले की भावना से कार्रवाई को लेकर मुलायम ने कहा था कि 'मैं जब रक्षा मंत्री था तो बोफोर्स मामले की फाइल गायब करा दी थी.' इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि 'राजनीतिक लोगों पर बदले की भावना से कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. सियासी लोग जेल जाएंगे तो राजनीति कैसे होगी?' उनके इस बयान के बाद काफी सियासी बवाल मचा था. दरअसल मुलायम सिंह यादव अच्छी तरह जानते हैं कि राजनीति में आपके दांवपेच सामने वाले को पता चल जाएं तो फिर हार सुनिश्चित होती है. शायद यही वजह है कि सियासत पर अपनी पकड़ की वजह से वो बड़े राजनीतिक पदों पर रहे और दशकों तक सत्ता की धुरी बने रहे.